जीव जनन कैसे करते हैं?
12/10/20241 min read
जनन और आनुवंशिकी की प्रक्रिया में विविधता का महत्त्व:
जनन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं, और यह जीवन के निरंतरता को बनाए रखने का आधार है। जनन की प्रक्रिया में जीवों के गुणसूत्रों के डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनती है, जो जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। इस प्रक्रिया में डी.एन.ए. की प्रतिकृति के दौरान कुछ बदलाव (म्यूटेशन) हो सकते हैं, जो आनुवंशिक विविधता का कारण बनते हैं।
डी.एन.ए. प्रतिकृति और उसकी विश्वसनीयता:
प्रजनन की प्रक्रिया में, डी.एन.ए. की प्रतिकृति जीव के गुणसूत्रों में बदलती है, लेकिन यह प्रक्रिया कभी भी पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं होती है। प्रतिकृति के दौरान कुछ छोटे-मोटे बदलाव (म्यूटेशन) हो सकते हैं, जो भविष्य में संतति में विभिन्नताएं उत्पन्न कर सकते हैं। इनमें से कुछ बदलाव ऐच्छिक होते हैं, और ये आनुवंशिक विविधता का कारण बन सकते हैं।
विविधता का महत्त्व:
आनुवंशिक विविधता प्रकृति में किसी भी जैविक समुदाय के अस्तित्व और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। गुणसूत्रों में आनुवंशिक गुणों का संदेश होता है, जो जनक से संतति तक जाता है। जब कोई वातावरण में बदलाव आता है, जैसे तापमान में वृद्धि या जल स्तर में परिवर्तन, तो किसी एक समूह का समूल विनाश हो सकता है। लेकिन अगर समूह में आनुवंशिक विविधता होती है, तो कुछ जीव ऐसे बदलते हुए वातावरण में जीवित रह सकते हैं।
इस प्रकार, आनुवंशिक विविधता जैविक समुदायों की उत्तरजीविता को बढ़ाती है और उन्हें पर्यावरणीय परिवर्तन के खिलाफ लचीलापन प्रदान करती है। यह जैविक विकास (बायोलॉजिकल इवोल्यूशन) का आधार होती है, क्योंकि यह विभिन्न प्रजातियों को नए वातावरण में सामंजस्य स्थापित करने में मदद करती है।
विविधता का महत्व सिर्फ अस्तित्व के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि इसके आधार पर विकासात्मक प्रक्रिया को भी बल मिलता है, जो विभिन्न वातावरणों में समायोजन और प्रजातियों के अस्तित्व की संभावनाओं को बढ़ाता है। जैविक विकास के साथ उत्पन्न होने वाली नई प्रजातियाँ, एक जीव की नई विशेषताओं को सृजित कर सकती हैं, जो उसे अपने पर्यावरण में बेहतर अनुकूलित कर सकती हैं।
प्रजनन के प्रकार :-
• अलैंगिक प्रजनन
• लैंगिक प्रजनन
अलैंगिक प्रजनन : जनन की वह विधि जिसमें सिर्फ एकल जीव ही भाग लेते है, अलैंगिक प्रजनन कहलाता है।
लैंगिक प्रजनन :- जनन की वह विधि जिसमें नर एवं मादा दोनों भाग लेते हैं, लैंगिक प्रजनन कहलाता है
अलैंगिक प्रजनन की विधियाँ :-
• विखंडन
• द्विविखंडन
• बहुखंडन
• खंडन
• पुनरुद्भवन (पुनर्जनन)
• मुकुलन
• बीजाणु समासंघ
• कायिक प्रवर्धन
• बीजाणु समासंघ
· विखंडन (Fission): विखंडन एक प्रकार का यौनविहीन प्रजनन है जिसमें एक जनक कोशिका दो या दो से अधिक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है। यह प्रजनन प्रक्रिया साधारणत: एकलकोशिकीय जीवों में पाई जाती है।
(क) द्विविखंडन (Binary Fission):
इसमें जनक जीव की एकल कोशिका दो समान भागों में विभाजित हो जाती है, और दोनों कोशिकाएँ पूर्णत: स्वतंत्र जीव बन जाती हैं।
उदाहरण: अमीबा, लेस्मानिया।
(ख) बहुखंडन (Multiple Fission):
इस प्रक्रिया में एक जनक कोशिका कई छोटे-छोटे भागों में विभाजित हो जाती है, जिनमें से प्रत्येक नया जीव बन जाता है। यह प्रक्रिया तब होती है जब पर्यावरणीय परिस्थितियाँ जीवों के लिए उपयुक्त नहीं होतीं, और जीव अपनी संतति को बचाने के लिए विभाजन करता है।
उदाहरण: प्लैज्मोडियम (जो मलेरिया का कारण बनता है)।
· खंडन (Fragmentation):
इस प्रजनन विधि में, सरल संरचना वाले बहुकोशिकीय जीव टूट कर छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाते हैं। प्रत्येक टुकड़ा पुनः बढ़कर एक नया जीव बन जाता है। इस विधि में पुनर्जनन की क्षमता बहुत अधिक होती है।
उदाहरण: स्पाइरोगाइरा (एक जलजीव शैवाल), कायलम।
· पुनरुद्भवन (Regeneration / Reproduction by Fragmentation):
पुनरुद्भवन में जब कोई जीव टूटकर कई टुकड़ों में विभाजित हो जाता है, तब प्रत्येक टुकड़ा अपना विकास करके एक नया जीव बन जाता है। यह प्रजनन विधि विशेष रूप से उन जीवों में पाई जाती है जिनमें पुनर्निर्माण की अद्भुत क्षमता होती है।
उदाहरण: प्लेनेरिया (यह सममित शरीर वाले कृमि हैं जो किसी भी भाग से पुनर्निर्माण कर सकते हैं), हाइड्रा (यह जल में रहने वाला बहुकोशिकीय जीव है जो छोटे टुकड़ों से पुनः विकसित होता है)।
· मुकुलन (Budding):
मुकुलन में जनक जीव के शरीर पर एक उभार उत्पन्न होता है, जिसे मुकुल कहा जाता है। यह मुकुल पहले नन्हा होता है, फिर धीरे-धीरे बड़ा होकर एक पूर्ण जीव में बदल जाता है और अंत में जनक से अलग हो जाता है। यह प्रजनन विधि विशेष रूप से नोन-फ्लैगलेट जीवों में पाई जाती है।
उदाहरण: हाइड्रा, यीस्ट (खमीर)।
· बीजाणु समासंघ (Spore Formation):
कुछ जीवों में बीजाणु समासंघ की प्रक्रिया होती है, जिसमें कुछ विशेष संरचनाएँ (जैसे बीजाणु धानी) उत्पन्न होती हैं। इन संरचनाओं में बीजाणु होते हैं जो मोटी दीवार से सुरक्षित होते हैं। जब पर्यावरणीय परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तब ये बीजाणु वृद्धि करके नए जीवों का निर्माण करते हैं। यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन जीवों में पाई जाती है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने जीवन चक्र को बचाने के लिए बीजाणुओं का निर्माण करते हैं।
उदाहरण: फंगस (कवक), मॉस।
· कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation):
कायिक प्रवर्धन में, नए पौधे का निर्माण किसी जीव के अवयवों (जैसे जड़, तना, पत्तियाँ आदि) से होता है। इसमें पौधा बिना बीज के अपने अंगों से नए पौधे उत्पन्न करता है। यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन पौधों में पाई जाती है जिनमें बढ़ने और बढ़ाने की अत्यधिक क्षमता होती है।
(a) कायिक प्रवर्धन की प्राकृतिक विधियाँ :-
• जड़ द्वारा :- डहेलिया, शकरकंदी
• तने द्वारा :- आलू, अदरक
• पत्तियों द्वारा :- ब्रायोफिलम की पत्तियों की कोर पर कलिकाएँ होती हैं, जो विकसित होकर नया पौधा बनाती है।
(b) कायिक प्रवर्धन की कृत्रिम विधियाँ :-
• रोपण :- आम
• कर्तन - गुलाब
• लेयरिंग :- चमेली
• ऊतक संवर्धन : आर्किक, सजावटी पौधे
• कायिक संवर्धन के लाभ :-
• बीज उत्पन्न न करने वाले पौधे; जैसे:- केला, गुलाब आदि के नए पौधे बना सकते हैं।
• नए पौधे आनुवंशिक रूप में जनक के समान होते हैं।
• बीज रहित फल उगाने में मदद मिलती है ।
• पौधे उगाने का सस्ता और आसान तरीका है।
7. बीजाणु समासंघ (Spore Formation):
बीजाणु समासंघ एक अलैंगिक प्रजनन प्रक्रिया है, जिसमें कुछ सरल बहुकोशिकीय जीवों के ऊर्ध्व तंतुओं (या अन्य संरचनाओं) पर सूक्ष्म, गोल बीजाणु धानी बनती है। इन धानियों में बीजाणु होते हैं, और जब ये बीजाणु अनुकूल वातावरण में आते हैं, तो ये वृद्धि कर नए जीवों का निर्माण करते हैं। यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन जीवों में पाई जाती है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हैं।
उदाहरण: राइजोपस (Rhizopus), प्लांटीगो, फंगस। इन जीवों में जब बीजाणु वातावरण में फैलते हैं, तो वे अंकुरित होकर नए जीवों का निर्माण करते हैं, जो अनुकूल वातावरण में जीवित रह सकते हैं।
8. ऊतक संवर्धन (Tissue Culture):
ऊतक संवर्धन एक अत्यधिक उपयोगी तकनीक है जो पौधों के नए जीवों का निर्माण करने के लिए प्रयोग की जाती है। इस विधि में पौधों की कोशिकाओं या ऊतकों को एक पोषक माध्यम में उगाया जाता है, जहाँ कोशिकाएँ गुणन करती हैं और कैलस (कोशिकाओं का गुच्छा) में परिवर्तित हो जाती हैं। फिर, कैलस को हॉर्मोन के माध्यम से विभेदन की प्रक्रिया में भेजा जाता है, जिससे नए पौधों का निर्माण होता है।
यह विधि विशेष रूप से उन पौधों में उपयोगी होती है, जिनमें संकरण या बीज से प्रजनन कठिन होता है। यह विधि वनस्पति विज्ञान और कृषि में अधिक प्रयोग की जाती है।
उदाहरण: आर्किड, सजावटी पौधे, और कृषि में उच्च गुणवत्ता वाले पौधे जैसे आलू और केले के पौधे।
9. लैंगिक प्रजनन (Sexual Reproduction):
लैंगिक प्रजनन वह प्रक्रिया है जिसमें नए जीवों का निर्माण दो विभिन्न लिंगों (नर और मादा) के युग्मकों (गामेट्स) के मिलन से होता है। इस प्रकार के प्रजनन में दोनों लिंगों की भागीदारी होती है, जो नए जीवन का निर्माण करते हैं।
निषेचन (Fertilization):
लैंगिक प्रजनन में नर और मादा युग्मक के मिलने की प्रक्रिया को निषेचन कहते हैं। निषेचन के बाद एक युग्मनज (Zygote) बनता है, जो विभाजन करके भ्रूण में परिवर्तित हो जाता है, और धीरे-धीरे एक नया जीव उत्पन्न होता है।विविधता का निर्माण:
इस प्रक्रिया में विविधता उत्पन्न होती है क्योंकि यह गुणसूत्रों के आदान-प्रदान से होता है, और प्रत्येक संतति में नए संयोजन उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार के प्रजनन से जैविक विविधता और विकास में सहायक कारक होते हैं।
10. पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन (Sexual Reproduction in Flowering Plants):
आवृतबीजी (एंजियोस्पर्म) पौधों में लैंगिक प्रजनन के अंग पुष्प होते हैं। पुष्प में दो प्रमुख जनन भाग होते हैं – पुंकेसर और स्त्रीकेसर, जिनमें क्रमशः नर और मादा युग्मक कोशिकाएँ होती हैं।
पुष्प के प्रकार:
एकलिंगी पुष्प (Unisexual Flower):
जब पुष्प में केवल या तो पुंकेसर (नर युग्मक) या स्त्रीकेसर (मादा युग्मक) होता है, तो उस पुष्प को एकलिंगी कहा जाता है।
उदाहरण: पपीता, तरबूज।उभयलिंगी पुष्प (Bisexual Flower):
जब पुष्प में दोनों पुंकेसर और स्त्रीकेसर होते हैं, तो इसे उभयलिंगी पुष्प कहा जाता है।
उदाहरण: गुड़हल, सरसों।
बीज निर्माण की प्रक्रिया:
परागण (Pollination):
परागकण (Pollen grains), जो नर पुष्प के परागकोश में उत्पन्न होते हैं, हवा, पानी या जन्तुओं द्वारा मादा पुष्प के वर्तिका (Stigma) पर पहुँचते हैं। इसे परागण कहते हैं। परागण दो प्रकार के होते हैं:स्वपरागण (Self Pollination): जब परागकण उसी फूल के वर्तिका पर पहुँचता है।
परपरागण (Cross Pollination): जब परागकण किसी अन्य फूल के वर्तिका पर पहुँचता है।
निषेचन (Fertilization):
परागकण से एक नलिका विकसित होती है, जो वर्तिका से होते हुए अंडाशय तक पहुँचती है, जहाँ नर और मादा युग्मक मिलते हैं और निषेचन होता है।बीज का निर्माण:
निषेचन के बाद युग्मनज में विभाजन होता है, जिससे भ्रूण का निर्माण होता है। बीजांड (ovule) से एक कठोर आवरण विकसित होकर बीज में बदल जाता है। अंडाशय फल में बदल जाता है, और पुष्प के अन्य भाग जैसे बाह्यदल, पंखुड़ी आदि झड़ जाते हैं।
1. अंकुरण (Germination):
अंकुरण वह प्रक्रिया है जिसमें बीज (जो भविष्य में पौधा बनने वाला है) या भ्रूण उपयुक्त पर्यावरणीय परिस्थितियों में विकसित होकर नया पौधा बनता है। यह प्रक्रिया तब शुरू होती है जब बीज को पानी, ऑक्सीजन और उचित तापमान मिलता है, जिससे बीज का अवशोषण, वर्धन और वृद्धि होती है। अंकुरण की प्रक्रिया में बीज का बाहरी आवरण टूटता है और भ्रूण के अंग (जड़, तना, पत्तियाँ) विकसित होते हैं।
अंकुरण के मुख्य चरण:
पानी का अवशोषण (Imbibition): बीज पहले पानी को अवशोषित करता है, जिससे बीज के अंदर का जीवन सक्रिय होता है।
ऊर्जा का उत्पादन (Energy Production): बीज के अंदर मौजूद स्टार्च को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है, जिससे वृद्धि की प्रक्रिया जारी रहती है।
नवोद्भिद का विकास (Development of Seedling): बीज का बाहरी आवरण फटता है और अंदर से जड़ और अंकुरित तना बाहर निकलते हैं, और ये पौधा बनने की ओर बढ़ते हैं।
उदाहरण: मूँगफली, भिंडी, गेहूँ।
2. मानव में प्रजनन (Reproduction in Humans):
मानवों में लैंगिक प्रजनन होता है, जिसमें नर और मादा के जननांगों के बीच युग्मन (fertilization) द्वारा नया जीवन उत्पन्न होता है। मानव प्रजनन की प्रक्रिया में दो मुख्य घटक होते हैं: नर और मादा युग्मक (गामेट्स), जिनका मिलन एक नया जीव उत्पन्न करता है।
2.1 लैंगिक परिपक्वता (Sexual Maturity):
लैंगिक परिपक्वता वह समय होता है जब नर और मादा दोनों में युग्मकों का निर्माण शुरू होता है। इस समय से व्यक्ति के शरीर में यौवन संबंधित परिवर्तन होते हैं। किशोरावस्था के इस विशेष समय को यौवनारंभ कहा जाता है।
यौवनारंभ के दौरान शरीर में लैंगिक हार्मोन जैसे एस्त्रोजेन (स्त्रियों के लिए) और टेस्टोस्टेरोन (पुरुषों के लिए) का उत्पादन बढ़ता है, जो शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं। इस समय से शरीर में लैंगिक विशेषताएँ विकसित होने लगती हैं।
2.2 यौवनारंभ पर परिवर्तन (Changes during Puberty):
किशोरावस्था में शरीर में कई परिवर्तन होते हैं, जो यह संकेत देते हैं कि व्यक्ति लैंगिक रूप से परिपक्व हो रहा है:
(a) किशोरों में समान परिवर्तन:
कांख और जननांगों के पास गहरे बालों का उगना: यह बाल शरीर के विभिन्न हिस्सों पर उगने लगते हैं, जैसे कांख, जननांग आदि।
त्वचा का तैलीय होना और मुँहासे निकलना: हार्मोनल परिवर्तन के कारण त्वचा पर तेल का उत्पादन बढ़ता है, जिससे मुँहासे (Acne) की समस्या हो सकती है।
(b) लड़कियों में परिवर्तन:
स्तन के आकार में वृद्धि: यह यौवन की प्रमुख पहचान है, जब लड़कियों के स्तन आकार में बढ़ने लगते हैं।
रजोधर्म (Menstruation) होना: लड़कियों में यौवन के दौरान पहला मासिक धर्म (period) शुरू होता है, जो उनके प्रजनन तंत्र के परिपक्व होने का संकेत है।
(c) लड़कों में परिवर्तन:
चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ निकलना: यह बदलाव लड़कों में यौवन के दौरान देखने को मिलता है, जब चेहरे पर बाल (दाढ़ी, मूंछ) उगने लगते हैं।
आवाज का फटना (Voice Break): लड़कों की आवाज गहरी होती है, जो यौवन के दौरान हार्मोनल परिवर्तन के कारण होती है।
2.3 लैंगिक परिपक्वता का महत्त्व:
प्रजनन क्षमता का विकास: यह समय वह होता है जब किशोरों की प्रजनन क्षमता विकसित होती है। लड़कियाँ अंडकोश (ovaries) से अंडाणु का उत्पादन करना शुरू करती हैं, और लड़के शुक्राणु का उत्पादन शुरू करते हैं।
जैविक और मानसिक परिवर्तन: यौवन के समय जैविक (शारीरिक) और मानसिक (मनोवैज्ञानिक) परिवर्तन होते हैं, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
हार्मोनल संतुलन: यौवन के दौरान हार्मोनल संतुलन बनता है, जो शरीर के समग्र विकास के लिए आवश्यक होता है।
3. लैंगिक जनन की प्रक्रिया (Process of Sexual Reproduction):
मानवों में लैंगिक जनन में दो मुख्य घटनाएँ शामिल होती हैं:
शुक्राणु और अंडाणु का मिलन (Fertilization): नर और मादा के जननांगों में युग्मकों (शुक्राणु और अंडाणु) का मिलन होता है, जिससे निषेचन (fertilization) होता है।
गर्भावस्था और भ्रूण का विकास: निषेचन के बाद भ्रूण अंडाशय में विकसित होता है और नौ महीने की गर्भावस्था के दौरान पूरा विकास करता है।
नर जनन तंत्र (Male Reproductive System):
नर जनन तंत्र वह संरचना है जिसमें जनन कोशिकाओं (शुक्राणु) का उत्पादन और निषेचन तक उनका मार्ग दर्शन किया जाता है। यह तंत्र युग्मन (fertilization) के लिए आवश्यक शुक्राणुओं का उत्पादन करता है और उन्हें मादा जनन तंत्र तक पहुंचाने के लिए रास्ता प्रदान करता है।
मुख्य अंग और उनके कार्य:
1. वृषण (Testes):
वृषण नर जनन तंत्र का प्रमुख अंग है, जिसमें शुक्राणुओं का निर्माण होता है।
यह शरीर के बाहर वृषणकोष (scrotum) में स्थित होते हैं, क्योंकि शुक्राणु निर्माण के लिए शरीर के सामान्य तापमान से कम तापमान की आवश्यकता होती है।
वृषण टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन का उत्पादन करते हैं, जो नर के यौवन परिवर्तन और शुक्राणु निर्माण के लिए आवश्यक है।
2. शुक्रवाहिनी (Vas Deferens):
यह नलिकाएँ वृषण से शुक्राणुओं को मूत्राशय की नली तक ले जाती हैं, जहाँ से शुक्राणु यौन उत्तेजना के दौरान बाहर निकलते हैं।
3. मूत्रमार्ग (Urethra):
यह नली मूत्र और वीर्य दोनों के बाहर निकलने का मार्ग है। शिश्न के माध्यम से वीर्य (स्पर्म) बाहर निकलता है।
4. संबंधित ग्रंथियाँ (Accessory Glands):
प्रोस्टेट ग्रंथि: यह वीर्य में स्राव डालती है, जो शुक्राणुओं को पोषण और सक्रियता प्रदान करता है।
सेमिनल वेसिकल (Seminal Vesicles): यह ग्रंथियाँ वीर्य के तरल भाग का उत्पादन करती हैं, जो शुक्राणुओं को परिवहन में मदद करता है।
कूपर ग्रंथि (Cowper’s Gland): यह वीर्य के बाहर निकलने से पहले मूत्रमार्ग को शुद्ध करती है और शुक्राणुओं को सुरक्षित रखने के लिए तरल स्रावित करती है।
यह ग्रंथियाँ मिलकर वीर्य (seminal fluid) बनाती हैं, जो शुक्राणुओं को पोषण और संरक्षण प्रदान करती है।
मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System):
मादा जनन तंत्र में वह संरचनाएँ और अंग शामिल हैं जो अंड कोशिका का निर्माण करती हैं, और यदि निषेचन होता है तो भ्रूण का विकास होता है।
मुख्य अंग और उनके कार्य:
1. अंडाशय (Ovaries):
अंडाशय मादा जनन तंत्र के दो प्रमुख अंग हैं, जहां अंड कोशिकाओं (ova) का निर्माण होता है।
हर महीने, एक अंडाशय एक परिपक्व अंड कोशिका का उत्पादन करता है।
जन्म के समय से ही अंडाशय में लाखों अपरिपक्व अंडाणु होते हैं। यौवन की शुरुआत पर इनमें से कुछ अंड परिपक्व होकर अंडाशय से बाहर निकलते हैं।
अंडाशय एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का भी उत्पादन करते हैं, जो यौवन और प्रजनन क्रिया को नियंत्रित करते हैं।
2. अंडवाहिका (Fallopian Tubes):
अंडाशय से निकलने के बाद अंड कोशिका अंडवाहिका में जाती है। यही वह स्थान है जहां अंड कोशिका और शुक्राणु का निषेचन (fertilization) होता है।
अंडवाहिका में फिम्ब्रिया (फालोपियन ट्यूब के अंत में झिल्ली युक्त अंग) द्वारा अंड कोशिका को गर्भाशय की ओर खींच लिया जाता है।
3. गर्भाशय (Uterus):
गर्भाशय एक थैलीनुमा संरचना है जहां भ्रूण का विकास होता है।
गर्भाशय में यदि निषेचन होता है, तो युग्मनज गर्भाशय में बैठकर विकास करना शुरू करता है और धीरे-धीरे भ्रूण में बदलता है।
गर्भाशय का आंतरिक भाग मांसल और कोशिकाओं से भरा होता है, जो भ्रूण के लिए उपयुक्त पोषण और सुरक्षा प्रदान करता है।
4. गर्भाशय ग्रीवा (Cervix) और योनि (Vagina):
गर्भाशय ग्रीवा गर्भाशय और योनि के बीच स्थित है, और यह जन्म के समय शिशु के मार्ग में मदद करता है।
योनि, जिसे बर्थ कैनाल भी कहा जाता है, वह मार्ग है जिससे शिशु जन्म लेते हैं। यह शिशु के विकास के दौरान गर्भाशय को बाहर से जोड़ता है।
निषेचन (Fertilization) और गर्भधारण:
निषेचन (Fertilization): जब मादा का अंड कोशिका और नर का शुक्राणु अंडवाहिका में मिलते हैं, तो निषेचन होता है और युग्मनज (zygote) बनता है।
गर्भावस्था (Pregnancy): निषेचित अंड युग्मनज बनकर गर्भाशय की दीवार से जुड़ जाता है और वहाँ से विकास शुरू होता है। इस दौरान भ्रूण में विभाजन और विकास की प्रक्रिया होती है।
अंडाशय का परिवर्तन: निषेचन के बाद, अंडाशय से प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है, जो गर्भाशय की दीवार को बनाए रखने में मदद करता है।
यदि निषेचन नहीं होता:
यदि अंड कोशिका का निषेचन नहीं होता, तो हर महीने गर्भाशय अपने अंदर की भित्ति को त्याग देता है, जो रक्त और म्यूकस के रूप में बाहर निकलता है। इस प्रक्रिया को रजोधर्म (Menstruation) कहा जाता है, जो लगभग हर महीने होती है।
रजोनिवृति (Menopause): 40-50 साल की उम्र में, महिलाओं के अंडाशय से अंड कोशिका का उत्पादन रुक जाता है, और मासिक धर्म (r) बंद हो जाता है, इसे रजोनिवृति कहा जाता है।
प्लेसेंटा (Placenta):
प्लेसेंटा एक महत्वपूर्ण अंग है जो गर्भवती मादा के गर्भाशय में भ्रूण और माँ के शरीर के बीच संबंध स्थापित करता है। यह भ्रूण को आवश्यक पोषक तत्व और ऑक्सीजन प्रदान करता है, जबकि भ्रूण से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों को माँ के शरीर द्वारा नष्ट किया जाता है।
प्लेसेंटा के मुख्य कार्य:
1. पोषण की आपूर्ति: प्लेसेंटा के माध्यम से माँ के रक्त से भ्रूण को ग्लूकोज, ऑक्सीजन, और अन्य आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं जो भ्रूण के विकास में सहायक होते हैं।
2. अपशिष्ट पदार्थों का निपटान: भ्रूण द्वारा उत्पादित अपशिष्ट पदार्थ (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, यूरिया) को प्लेसेंटा के माध्यम से माँ के शरीर में स्थानांतरित किया जाता है, जहाँ ये अपशिष्ट पदार्थ माँ के शरीर द्वारा नष्ट हो जाते हैं।
3. हार्मोन उत्पादन: प्लेसेंटा गर्भावस्था के दौरान कुछ महत्वपूर्ण हार्मोन (जैसे प्रोजेस्टेरोन, एचसीजी - मानव कोरियानीगोनाडोट्रोपिन) का उत्पादन करता है, जो गर्भावस्था को बनाए रखने और भ्रूण के विकास के लिए आवश्यक होते हैं।
4. इम्यून प्रोटेक्शन: प्लेसेंटा भ्रूण को माँ के शरीर से आने वाले संक्रमणों से बचाने में मदद करता है। यह भ्रूण को कुछ हद तक इम्यून सुरक्षा प्रदान करता है।
गर्भकाल (Gestation Period):
गर्भकाल वह अवधि है जब अंडाणु का निषेचन होता है और भ्रूण का विकास शुरू होता है। यह समय लगभग 9 महीने (280 दिन) होता है, जो तीन त्रैमासिक (trimester) में विभाजित होता है।
प्रथम त्रैमासिक (1-3 महीने): इस अवधि में भ्रूण के अंगों का निर्माण होता है और वह आकार में बढ़ने लगता है।
द्वितीय त्रैमासिक (4-6 महीने): भ्रूण के अंगों का विकास जारी रहता है और वह सक्रिय रूप से बढ़ता है।
तृतीय त्रैमासिक (7-9 महीने): भ्रूण का शरीर पूरी तरह से विकसित हो जाता है और जन्म के लिए तैयार होता है।
गर्भकाल में भ्रूण में कई विकासात्मक बदलाव होते हैं, जैसे तंत्रिका तंत्र का विकास, मांसपेशियों का निर्माण, और आंतरिक अंगों का कार्य शुरू होना।
जनन स्वास्थ्य (Reproductive Health):
जनन स्वास्थ्य का मतलब शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और व्यावहारिक रूप से जनन से जुड़े स्वास्थ्य की स्थिति है। यह स्वस्थ जीवन जीने के लिए महत्वपूर्ण है, और इसमें प्रजनन संबंधित सभी समस्याओं का इलाज और निवारण शामिल है।
यौन स्वास्थ्य: इसमें सुरक्षित यौन संबंध, यौन संचारित रोगों (STD) से बचाव, और यौन शिक्षा का प्रचार-प्रसार शामिल है।
प्रजनन स्वास्थ्य: इसमें गर्भधारण से जुड़े स्वास्थ्य, गर्भावस्था के दौरान देखभाल, और सुरक्षित प्रसव की देखभाल शामिल है।
लैंगिक संचरण रोग (Sexually Transmitted Diseases - STDs):
लैंगिक संचारित रोग वे रोग होते हैं जो यौन संपर्क के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं।
प्रमुख STDs:
1. जीवाणु जनित (Bacterial STDs):
गोनोरिया (Gonorrhea): यह एक बैक्टीरिया जनित रोग है जो मूत्रमार्ग, ग्रीवा, गर्भाशय, योनि और गले में संक्रमण पैदा करता है।
सिफलिस (Syphilis): यह एक बैक्टीरिया जनित रोग है जो शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित कर सकता है।
2. विषाणु जनित (Viral STDs):
HIV/AIDS: यह विषाणु जनित रोग है जो इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देता है और शरीर को संक्रमण से बचाव करने की क्षमता कम कर देता है।
वर्ट्स (Warts): यह एचपीवी (HPV) वायरस द्वारा होने वाला रोग है, जो जननांगों के आसपास मस्से (warts) उत्पन्न कर सकता है।
कंडोम का उपयोग इन रोगों के फैलाव को रोकने के लिए प्रभावी तरीका हो सकता है, हालांकि यह पूर्ण सुरक्षा नहीं देता।
गर्भरोधन (Contraception):
गर्भधारण को रोकने के उपायों को गर्भरोधन कहा जाता है। यह एक महत्वपूर्ण तरीका है जो परिवार नियोजन में मदद करता है और अनचाहे गर्भधारण से बचाव करता है।
गर्भरोधन के प्रकार:
1. यांत्रिक अवरोध (Mechanical Contraception):
कंडोम: यह नर और मादा दोनों द्वारा उपयोग किया जा सकता है और यह शुक्राणु को अंडाणु तक पहुंचने से रोकता है।
सर्वाइकल कैप: यह योनि में डाला जाता है और गर्भाशय ग्रीवा को ढकता है, जिससे शुक्राणु गर्भाशय में प्रवेश नहीं कर पाते।
2. रासायनिक तकनीक (Chemical Contraception):
हॉर्मोनल गर्भनिरोधक गोलियां: यह दवाइयाँ हॉर्मोन के स्तर को नियंत्रित करती हैं और अंडाणु के उत्पादन को रोकती हैं।
3. IUCD (Intrauterine Contraceptive Device):
यह एक छोटा यांत्रिक डिवाइस है जो गर्भाशय में स्थापित किया जाता है। यह गर्भधारण को रोकने में मदद करता है।
4. शल्यक्रिया तकनीक (Surgical Techniques):
नसबंधी (Vasectomy): पुरुषों में शुक्रवाहिकाओं को काट कर और बांध कर शुक्राणु के स्थानांतरण को रोकना।
ट्यूबेक्टोमी (Tubectomy): महिलाओं में अंडवाहिनी को अवरुद्ध करना ताकि अंडाणु का स्थानांतरण न हो।
भ्रूण हत्या (Feticide):
भ्रूण हत्या वह प्रक्रिया है जिसमें गर्भ में पल रहे भ्रूण को मारा जाता है। यह प्रथा समाज में लिंग अनुपात को असंतुलित कर सकती है और एक स्वस्थ समाज के लिए यह हानिकारक है। भ्रूण लिंग निर्धारण और भ्रूण हत्या के खिलाफ कड़ी जागरूकता और कानूनों की आवश्यकता है ताकि संतुलित लिंग अनुपात बनाए रखा जा सके।
संतुलित लिंग अनुपात सुनिश्चित करने के लिए समाज में जागरूकता फैलाना और भ्रूण हत्या को रोकना आवश्यक है।
